| मुश्किलें लाख और इक जां है, टूटी कश्ती है तेज़ तूफाँ है। झूट के पाँव क्यों नही होते, सच इसी बात से परेशां है। तितलिओं को पता नही होता, सरहदों मैं बंटा क्यों इन्सां है। उनकी आंखों के गहरे सागर मैं, आपकी मौत का हे सामाँ है.. थोडी शबनम बिखेर लेने दे, जिंदगी चार दिन की मेहमां है॥ है 'पथिक' लाख मुश्किलें फ़िर भी न समझना की हम परेशां है..... |
Friday, 13 February 2009
gazal
वैलेंटाइन डे विशेष
| लैला-मजनू की कहानी को हवा देते रहे, ख़ुद रहे नाकाम फ़िर भी तजुर्बा देते रहे। मील के पत्थर की तरह हम किनारे पर पड़े, दूसरों को मंजिलों का बस पता देते रहे. हम वहां तक जा न पाये पर तस्सली ये रही, जो मिला गुमसुम सा उसको होंसला देते रहे, ये हमारे सब्र का था इम्तिहान या और कुछ, वो दगा करते रहे और हम दुआ देते रहे,ख़ुद थे अंधेरे मैं लेकिन थी उमीदे-रौशनी, सुबह तो होगी कभी ये फलसफा देते रहे, पार कर पाये न जब ख़ुद इश्क का सागर पथिक दूसरों को तैरने का मशविरा देते रहे.... |
Subscribe to:
Posts (Atom)
