Friday, 13 February 2009

gazal

मुश्किलें लाख और इक जां है,
टूटी कश्ती है तेज़ तूफाँ है।

झूट के पाँव क्यों नही होते,
सच इसी बात से परेशां है।

तितलिओं को पता नही होता,
सरहदों मैं बंटा क्यों इन्सां है।

उनकी आंखों के गहरे सागर मैं,
आपकी मौत का हे सामाँ है..

थोडी शबनम बिखेर लेने दे,
जिंदगी चार दिन की मेहमां है॥

है 'पथिक' लाख मुश्किलें फ़िर भी
न समझना की हम परेशां है.....

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